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Saturday, 3 December 2016

क्रेडिट कार्ड नहीं अब आधार कार्ड से होगा भुगतान, जानें कैसे

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आधार कार्ड बनाने वाली संस्था, यूआईडीएआई भारतीय समाज को कैशलेस समाज बनाने की दिशा में जोर-शोर से कोशिश में जुट गया है। संस्था ने इस प्लेटफॉर्म के लिए इस्तेमाल के लिए आधार के जरिये बायोमैट्रिक पहचान क्षमता 10 करोड़ से 40 करोड़ तक ले जाने का फैसला किया है। 
इसके साथ सरकार एक ऐसे कॉमन मोबाइल फोन एप विकसित करने में लगी है जिससे दुकानदार और कारोबारी आधार प्लेटफॉर्म के जरिये पेमेंट हासिल कर सकते हैं। इसके लिए डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, पिन और पासवर्ड की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस मोबाइल एप के जरिये हैंडसेट, कस्टमर की बायोमैट्रिक पहचान के लिए इस्तेमाल किए जा सकेंगे। 

यूआईडीएआई के सीईओ अजय भूषण पांडे ने पत्रकारों से कहा कि यूआईडीएआई, बायोमैट्रिक पहचान मौजूद 10 करोड़ से बढ़ा कर 40 करोड़ करना चाहता है। उन्होंने कहा कि हम आम लोगों को इस ट्रांजेक्शन के तरीके बारे में बताएंगे और इस तरह 40 करोड़ पहचान तक अपनी क्षमता बढ़ाएंगे। 

उन्होंने कहा कि इस तरह की कोशिशों से नोटबंदी और ब्लैकमनी खत्म करने के उपायों से पैदा हुई फौरी दिक्कतों को रोकने में मदद मिलेगी। साथ ही वित्तीय लेनदेन में और पारदर्शिता भी आएगी। 12 अंकों का आधार नंबर 1.08 करोड़ लोगों को बांटा जा जा चुका है और इसके तहत लगभग 99 फीसदी वयस्क कवर हो चुके हैं। 

Source : AMAR UJALA

Wednesday, 31 August 2016

आधार कार्ड के बिना नहीं उठा सकेंगे नीचे उल्लेखित 9 सेवाओं का लाभ.....

बदलते समय में आधार कार्ड हुआ बेहद जरुरी
जिनके आधार कार्ड नहीं बन सके हैं,जल्द बनाने की करें जुगत 
आधार कार्ड के बिना नहीं उठा सकेंगे नीचे उल्लेखित 9 सेवाओं का लाभ.....
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नई दिल्ली : मुकेश कुमार सिंह
अगर आपने अब तक अधार कार्ड नहीं बनाया है तो बिना देर किए उसे फौरन बनवा लीजिये । क्योंकि अब अगर आपके पास आधार कार्ड नहीं होगा तो आप कई सेवाओं के लाभ से पूरी तरह वंचित रह जाएंगे ।दरअसल सरकार बहुत ही जल्द कई सरकारी सेवाओं के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य करने जा रही है ।
आपको बता दें कि देश के करीब 104 करोड़ लोगों के पास आधार कार्ड मौजूद है और सरकार की योजना है कि सितंबर 2016 तक देश के हर नागरिक के पास अपना आधार कार्ड उपलब्ध हो ।ऐसे में आज हम आपको उन सर्विसेज के बारे में बता रहे हैं, जिनका इस्तेमाल आप बिना आधार कार्ड के नहीं कर पाएंगे ।

Saturday, 13 August 2016

देश की एक बड़ी और अच्छी खबर प्रेस कार्ड बेचने वालों पर दर्ज होगा अपराधिक मामला,पत्रकारिता की शाख बचने की जगी उम्मीद |

एक बड़ी और अच्छी खबर
प्रेस कार्ड बेचने वालों पर दर्ज होगा अपराधिक मामला
अब बेजा प्रेस कार्ड पर लगेगा लगाम
सरकार के विभिन्य विभागों में घूम--घूम कर वसूली करने वालों को बड़ा झटका
पत्रकारिता की शाख बचने की जगी उम्मीद 

मुकेश कुमार सिंह------
पत्रकारिता के गिरते स्तर तथा पत्रकारिता जगत में असामाजिक तत्वों के प्रवेश से चिंतित केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा समाचार पत्रों के पंजीकरण,समाचार पत्र/पत्रिका व टीवी चैनल तथा न्यूज एजेंसी द्वारा जारी प्रैस कार्ड के लिए नियमावली तैयार की जा रही है तथा मौजूदा नियमावाली में संशोधन किए जाने पर गंभीरता से मंथन चल रहा है ।मिली जानकारी के अनुसार देशभर में बढ़ रहे अखबारी आंकड़े और पत्रकारों की बढ़ रही संख्यां से पाठकों की जागरूकता में वृद्धि हुई है,वहीं कुछ ऐसे चेहरों ने भी पत्रकारिता जगत में दस्तक दे दी है, जिसके कारण पत्रकारिता पर सवालिया निशान लगने शुरू हो गए हैं ।
अब पत्रकारिता क्षेत्र में होगी शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य.....
बता दें की अभीतक समाचार पत्र,पत्रिका के पंजीकरण के बाद प्रकाशक व संपादक एक-दो अंक प्रकाशित कर,अनगिनत लोगों को प्रैस कार्ड जारी कर देते थे जिनका पत्रकारिता से कोई लेना--देना नहीं होता है ।ऐसे चेहरों की बदौलत पत्रकारिता पर लगातार उंगलियां उठती रही है ।केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय समाचार पत्र, पत्रिका के पंजीकरण के लिए आवेदक की शैक्षणिक योग्यता पत्रकारिता में डिग्री की शर्त को अनिवार्य करने जा रहा है ।यह खबर बेहद सुकून भरा इसलिए है की पत्रकारिता के मानक और उसकी कसौटी को अब नजरअंदाज करना मु।किन नहीं होगा ।
समाचार पत्रों का प्रकाशन बंद कर सकती है केंद्र सरकार......
हमारी जानकारी के मुताबिक़ दैनिक समाचार पत्रों,न्यूज एजेंसियों और टीवी चैनल के रिपोर्टर के लिए संबंधित जिला मैजिस्ट्रेट की स्वीकृति,उनका पुलिस वैरीफिकेशन होने उपरांत जिला सूचना एवं लोक संपर्क विभाग द्वारा प्रैस कार्ड तथा प्रैस स्टीकर जारी किए जाने की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जा रहा है ।अन्य समाचार पत्र,पत्रिकाओं के प्रकाशक व संपादक का प्रेस कार्ड सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी किया जाएगा ।सरकारी तंत्र द्वारा जारी प्रेस कार्ड और प्रेस स्टीकर ही मान्य आगे से होंगे ।केंद्र सरकार द्वारा उन समाचार पत्र व पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद किया जा सकता है, जिन्होंने पिछले तीन वर्ष से अपनी वार्षिक रिपोर्ट जमा नहीं करवाई है ।
प्रेस कार्ड बेचने वालों पर दर्ज होगा अपराधिक मामला......
चर्चा तो यह भी है कि किसी भी क्षेत्र से अपना प्रतिनिधि नियुक्त करने वाला दैनिक समाचार पत्र,न्यूज चैनल और न्यूज एजेंसीज को प्रतिनिधि नियुक्त करने के लिए जिला मैजिस्ट्रेट को आवेदन करना होगा । फिर जिला सूचना व जनसंपर्क अधिकारी के तकसीद के उपरांत जिला मैजिस्ट्रेट स्वीकृति प्रदान करेंगे ।जिला सूचना व जनसंपर्क अधिकारी अपनी रिपोर्ट में दर्शाएंगे की अमूक दैनिक समाचार पत्र, न्यूज चैनल और न्यूज एजेंसीज को इस क्षेत्र से प्रतिनिधि की जरूरत है । संशोधित नियमावाली के चलते,यह साफ़ है की प्रेस  कार्ड की खरीद-फरोख्त तथा प्रेस लिखे वाहनों पर सरकारी तंत्र की नजर रहेगी ।नियम और कानून के खिलाफ तथ्य पाए जाने के उपरांत अपराधिक मामला कार्ड धारक,कार्ड जारी करने वाले हस्ताक्षर तथा प्रेस लिखे वाहन के मालिक पर दर्ज होगा ।इसमें कोई शक--शुब्बा नहीं है की केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की इस संभावित योजना पर अमल होने से पत्रकारिता का मानचित्र बदल जाएगा ।
क्या कहती है पुलिस....
पुलिस अधिकारी से लेकर पुलिस जवान तक कहते हैं की हम खुद प्रेस कार्ड वालो से परेशान हैं ।कैसे पता किया जाये की कोन सही पत्रकार है और कोन फर्जी ।इसके लिये जैसे ही नए आदेश आते हैं,वैसे ही प्रेस लिखे सभी वाहनों की जाँच की जायेगी और जो भी सूचना जनसम्पर्क विभाग की लिस्ट में नहीं होगा उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज होगा ।
साभार---दून वेदना हिन्दी दैनिक समाचार पत्र,उत्तर प्रदेश / उत्तराखण्ड /देहली से प्रकाशित ।

Tuesday, 9 August 2016

प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत मिशन को लग रहा पलीता |

महापुरुषों की हो रही अनदेखी
प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत मिशन को लग रहा पलीता
महापुरुषों की आदमकद प्रतिमा के चारों ओर उगे हैं जंगल
जानवरों के लिए बना ऐशगाह

मुकेश कुमार सिंह की दो टूक---
सहरसा में महापुरुषों की आदमकद प्रतिमाएं तो चौक--चौराहे पर लगा दी गयी हैं लेकिन उनको देखने की फुरसत जिला प्रशासन,सामाजिक संगठन और आम--अवाम किसी को नहीं है । महापुरुषों की प्रतिमा जहां लगी हुयी हैं,वहाँ ना तो समय--समय पर साफ़--सफाई होती है और ना ही सुरक्षा का कोई इंतजाम है ।देश के प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी स्वच्छ भारत मिशन के तहत पुरे भरत वर्ष को स्वच्छ बनाने की मुहीम चला रहे हैं ।साथ ही उनकी यह भी मंशा है की महापुरुषों की प्रतिमा का बेहतर रख--रखाव हो ।महापुरुष सिर्फ जयंती और पूण्य तिथि तक सीमित ना रहें ।लेकिन उनकी सोच को पूरी तरह से ग्रहण लगाया जा रहा है ।हम आपको सहरसा शहर के बीचो--बीच कुंवर सिंह चौक का नजारा दिखा रहे हैं जहां देश के लिए अपने प्राण की आहुति देने वाले बाबू कुंवर सिंह की आदमकद प्रतिमा लगी हुयी है ।लेकिन देखिये किस तरह से इस देशभक्त के सम्मान के साथ खिलवाड़ हो रहा है ।उनकी प्रतिमा के बगल में गाय मस्ती से अपना पेट भर रही है ।वैसे बताते चलें की अभी महज हम एक तरह की ही तस्वीर आपको दिखा पा रहे हैं ।बताना लाजिमी है की आवारा कुत्ते भी यहां पर अक्सर आराम फरमाते देखे जाते हैं ।इस तस्वीर को देखकर जनता खुद तय करे की यहां महापुरुष के साथ कैसा सलूक हो रहा है ।हम तो इतना जरूर कहेंगे की ""बर्बादे गुलिस्तां को एक ही उल्लू काफी है,जहां हर शाख पर उल्लू बैठा हो,अंजामे गुलिस्तां क्या होगा ।

Wednesday, 3 August 2016

रील पुलिस को तालियाँ और रीयल पुलिस को गालियाँ


रीयल पुलिस 
रील पुलिस 
मुकेश कुमार सिंह की कलम से----            
आज हम एक गंभीर विषय पर ना केवल चर्चा  हैं बल्कि देश स्तर पर इस विषय पर तटस्थ बहस और विमर्श हो इसकी अपील भी कर रहे हैं। देश के संविधान क्रियान्वयन के समय से ही एक प्रश्न आजतक बेउत्तर मौजूं है.आखिर क्या है हमारी पुलिस की विफलता का राज?आखिर क्या वजह है की तमाम भगीरथ प्रयासों और मशक्कत के बाद भी हमारी पुलिस जनता के बीच आजतक अपनी वह छवि नहीं बना पायी है जो विदेशों में वहाँ की पुलिस ने बना रखी है।हमारी समझ से इस प्रश्न का उत्तर बहुत ही साधारण है और वजह भी कोई खास नहीं है।व्यापक परिदृश्य में आंकड़ों पर गौर करें तो "हमारे देश के लोग कानून से नहीं बल्कि पुलिस से डरते हैं"जबकि इसके ठीक उलट विदेशों में लोग अपने देश के कानून को सम्मान देते हैं और पुलिस को सहयोग।वहाँ की जनता अपनी पुलिस से नहीं बल्कि देश के कानून से डरती है।जाहिर तौर पर यही कारण है की विदेशों में पुलिस कामयाब और सम्मानित है लेकिन अपने देश में पुलिस ठीक इसके विपरीत नजर आती है।भारतीय परिवेश में आज "खाकी"का नाम जुवां पर आते ही एक अजीबो--गरीब छवि आँखों के सामने आ जाती है। आम धारणा यह है की खाकी वर्दी में जो व्यक्ति है वह कठोर,निर्दयी और भ्रष्ट हैवान है और जिसका भय भारतीय जनता के बीच वर्षों से बना हुआ है।हांलांकि मुट्ठी भर ऐसे लोग जरुर हैं जो खाकी पहने व्यक्तियों को समझते हैं। उन्हें पता है उनकी परेशानियां,मजबूरियां,आवश्यकताएं और अपेक्षाएं।यहाँ गौरतलब है की उन खाकी वर्दीधारियों की ऐसी छवि बनायी किसने और लोग यह क्यों नहीं समझते हैं की उनका भी एक परिवार है।उनकी भी एक व्यक्तिगत जिन्दगी है।उन्हें भी समाज से ना केवल अपेक्षा है बल्कि उनके सीने में भी धड़कता हुआ एक दिल है।क्या लोगों ने कभी यह सोचने की जहमत उठायी है की वह अपने परिवार को कितना समय दे पाते हैं।अगर उनकी तैनाती दूर--दराज के इलाके में है तो वे कितने अरसे बाद अपने स्वजन--परिजनों की एक झलक देख पाते हैं?दिन हो या रात अफसरों के तेवर और अपराधियों की चुनौतियों के बीच वे अपना मानसिक और शारीरिक संतुलन आखिर कैसे बरकरार रख पाते हैं?ज़रा समझिये की हेलमेट पहनने में आपकी सुरक्षा है लेकिन उसे पहनाने की जिम्मेदारी पुलिसकी?गलत तरीके से वाहन चलाने पर दुर्घटनाग्रस्त आप होते हैं लेकिन आपको अस्पताल पहुंचाने की जिम्मेदारी पुलिस की?अपने समाज पर अत्याचार होता देख आप अपने घर में दुबक जाते हैं लेकिन उस अत्याचारी से बचाने की जिम्मेदारी पुलिस की?आँखों के सामने कत्ल हुआ किसी का लेकिन गवाह ढूंढने की जिम्मेदारी पुलिसकी?ऐसी ही ना जाने कितनी समस्याएं हैं जिसके जिम्मेवार हम स्वयं हैं लेकिन सारी जिम्मेदारी पुलिस की।यहाँ एक विचित्र बात पर प्रकाश डालना आवश्यक है की आम नागरिक अपने अधिकारों के प्रति तो जागरूक हैं लेकिन जब अपने सामाजिक कर्तव्यों और दायित्वों की बात आती है वे उसकी उपेक्षा कर अनभिज्ञता प्रकट कर देते हैं।अगर सामान्य नागरिक की किंचित जागरूकता और सहयोग हमारी पुलिस को मिल जाए तो हम डंके की चोट पर कहते हैं की हमारी पुलिस कितनी सक्रिय हो सकती है,हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते?
ज़रा आप तुलना करिए नागरिक सुरक्षा बल और सेना के बीच संसाधन और सुविधाओं की तो स्वतः ही आपकी सहानुभूति नागरिक सुरक्षा बल के प्रति हो जायेगी।सैनिक शहीद हो तो मान--सम्मान और आर्थिक अनुदान।लेकिन एक कांस्टेबल अवकाश प्राप्त हो तो अपने ही पेंशन के लिए कार्यालयों के अनगिनत चक्कर,अधिकारियों के समक्ष एड़ियों की रगड़ और खतो--किताबत,तब जाकर कहीं मिलता है मामूली सा पेंशन।उस मामूली पेंशन से उसके परिवार की तो छोड़िये,उसके खुद का गुजारा हो पाना भी मुश्किल है।सेना का जवान गर्व से कहता है की मैं "फौजी?लेकिन एक कांस्टेबल के दिल से पूछिये तो वह बताएगा  की कितनी तकलीफों से सनी होती है पुलिस की नौकरी।उसका दिल रोता है लेकिन उसे अपनी जुबान बंद रखनी पड़ती है।जानते हैं क्यों?वह इसलिए की उसे ही सुननी है हमारी और आपकी फ़रियाद और उसे ही करनी है हमारी और आपकी सुरक्षा।चूँकि पुलिस पर तरह--तरह के आरोप लगते रहते हैं इसलिए आज हम इस विषय को गंभीरता से उठाने का प्रयास कर रहे हैं।भारत जैसे विशाल देश में आजादी के बाद धर्मों को सम्मानपूर्वक देखने का सपना हमारे राष्ट्र नायकों ने देखा था।उन्होनें कल्पना की थी की उनके बाद की पीढियां उसका अक्षरशः अमल करेगी।लेकिन बड़े खेद की बात है की इस धर्म निरपेक्ष देश में आज सभी राजनीतिक पार्टियां अपने स्वार्थ के लिए जनता को धर्म,जाति,वर्ण,लिंग इत्यादि के प्रति उत्प्रेरित कर के देश को ना जाने कितने भागों में बाँट रही है।लेकिन इस भयावह स्थिति के बीच एक ऐसा कौम है जो सभी भेद--भाव को भूलकर न केवल एकजुट होकर बल्कि धर्मनिरपेक्ष होकर रात--दिन देश की आंतरिक सुरक्षा कर रहा है।बाबजूद इसके विडंबना देखिये की उनकी इस ईमानदारी पर आजतक किसी का ध्यान नहीं गया।क्या हमने कभी सोचा है की भारतीय पुलिस ने स्वतंत्रता से लेकर आजतक कभी भी अपना कार्य धर्म इत्यादि के आधार पर किया?पुलिस ने कभी यह कहा की आप हिन्दू हैं तो आपकी प्राथमिकी दर्ज की जायेगी?क्या आप मुसलमान हैं,तभी आपकी सुरक्षा की जायेगी?सिख होकर दुर्घटना के शिकार हुए व्यक्ति ही ईलाज के लिए अस्पताल पहुंचाए जायेंगे?इसाई की लाश अगर लावारिश मिले तो उसे दफनाया जाएगा?निम्न और पिछड़ी जातियों को थाने में आने की मनाही है?क्या उच्च जाति के लोगों के लिए थाने में कालीन बिछी है?बड़ी अहम् बात है की जहां हमारे देश में धर्म और जाति के नाम पर तरह--तरह के खेल हो रहे हैं वहीँ पुलिस पुरे देश देश में धर्म निरपेक्ष होकर अपराधियों से मुकाबला कर रही है।यही नहीं हमारी समझ से पुलिस जनता को बिना किसी भेदभाव के सुरक्षा देने का हर संभव प्रयास भी कर रही है।अब इस पुरे प्रकरण में पुलिस कितना कामयाब है,यह एक अलग बात है।जहां तक हमारी समझ जाती है उसके मुताबिक़ वर्दी का कोई मजहब नहीं होता और पुलिस किसी धर्म विशेष के लिए कतई काम नहीं करती है।पुलिस की गोली सिर्फ अपराधियों पर चलती है और चलने से पहले यह नहीं पूछती है की आप किस धर्म के हैं।कई ऐसे उदाहरण हैं जब अपराध में लिप्त कई धर्म गुरुओं को पुलिस ने दबोचा है।पद,रसूखवालों से लेकर बड़े ओहदेदारों और राजनेताओं को भी पुलिस ने बेड़ियाँ पहनाई है।हमारी पुलिस कौमी एकता की प्रतीक है।लेकिन इन तमाम सच के बीच अनगिनत वाकये इस बात के गवाह हैं की पुलिस पर से आमजन का भरोसा आज एक तरह से कहें तो तो उठ सा गया है।पुलिस को लेकर ना तो कोई अच्छा सोच रहे हैं,ना अच्छा बोल रहे हैं और ना अच्छा लिख रहे हैं।हमने तक़रीबन "विवादास्पद"बनी पुलिस पर समीचीन और तटस्थ पड़ताल की एक कोशिश की है। वर्तमान परिवेश में फिल्म आज भी जनता के मनोरंजन का मुख्य साधन है।खासकर ऐसी फ़िल्में जिसमें एक्शन,मारधाड़ और रोमांच हो तो उसका जादू सर चढ़कर बोलता है। यूँ हिंदी फिल्मों का फार्मूला कमोबेस एक ही होता है जिसमें हीरो--हिरोईन,नाच--गाना,विलेन और अंत में क्लाईमेक्स।इसी क्रम में पुलिसका प्रवेश होता है,फिर भाग--दौड़,गोला--बारूद और विलेन की मौत या फिर उसकी नाटकीय ढंग से गिरफ्तारी होती है।यहाँ पर पुलिस की कार्यशैली और उसके जांबाज अंदाज के लिए दर्शकों की भरपूर तालियाँ मिलती है।इतिहास गवाह है की आजतक लगभग सभी नायकों चाहे वह अमिताभ बच्चन,धर्मेन्द्र,संजीव कुमार,दिलीप कुमार,शशि कपूर,ओमपुरी,संजय दत्त, शाहरुख खान,सलमान खान,सन्नी देओल,अजय देवगन,सुनील सेट्ठी,अक्षय कुमार और ना जाने कितने कलाकारों ने पुलिस के रूप में पोजेटिव भूमिका निभायी है।दर्शकों ने इन फ़िल्मी पुलिसवालों के लिए ना केवल भरपूर तालियाँ बजाई है बल्कि जमकर उनकी तारीफ़ भी की है।लेकिन ये रील लाईफ की पुलिस है।रीयल लाईफ की पुलिस का अवलोकन करें तो हमारी पुलिस बिना बेहतर संसाधन के वास्तव में सामाजिक विलेनों से हरपल लड़ रही है।यहाँ यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की वह काफी हद तक अपनी सीमाओं में बंधे होने के बाद भी कामयाब है।फिर भी हमें केवल उनकी नाकामियाँ ही नजर आती हैं और नतीजतन उन्हें गालियाँ दी जाती है।अगर हमारी पुलिस सच में काहिल और निकम्मी भर है तो आज भारत के सभी कारागारों में अपराधी खचाखच कैसे भरे हैं?क्या वे अपने गुनाह स्वयं कबूल करके जेल गए हैं/अगर हमारी पुलिस घर बैठे सिर्फ वेतन ले रही है तो फिर भारत के सभी छोटे--बड़े न्यायालयों में करोड़ों अपराधिक मुकदमें क्या यूँ ही चल रहे हैं?नागरिक सुरक्षा बल और सैन्य बल के संसाधन और जिम्मेवारियों की अगर तुलना की जाए तो चौंकाने वाले सच सामने आते हैं।बड़ा सवाल यह है की क्या नागरिक सुरक्षा बल को सैनिकों जैसी सुविधाओं की आवश्यकता नहीं है? क्या पुलिस को भी सेना की भांति  सम्मान की जरुरत नहीं है?क्या पुलिस को सैनिकों की तरह अवकाश की दरकार नहीं है?यह बिल्कुल आईने की तरह साफ़ है की अगर पुलिस को हम ऐसी सुविधाएं मुहैय्या करा दें तो हमारा हर कांस्टेबल ना केवल अजय देवगन और हर दारोगा अमिताभ बच्चन होगा बल्कि यथार्थ की पुलिस बिल्कुल फिल्मों जैसी होगी और फिल्म की तरह The End हमेशा सुखदायी होगा।
आखिर में आपसे एक बात पूछने की कोशिश कर रहा हूँ की आप ने एक डॉक्टर,एक शिक्षक,एक अधिकारी से लेकर रसूखदारों और नेताओं तक को "थैंक यू" जरुर कहा होगा लेकिन क्या आपने कभी एक पुलिसवाले से कभी "थैंक यू "कहा है? ईमानदारी से कभी उन्हें भी "थैंक यू"कहकर देखिये।मेरा दावा है की उनकी आँखे ना केवल भर आएँगी बल्कि उनका कलेजा मुंह को आ जाएगा।

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